Monday, October 26, 2009

बढता समय घटी मानसिकता |

बढता समय घटी मानसिकता |

जैसे जैसे समय बीत रहा है लोगो ने अपना नया रूप बना लिया है| कुसक समये पहले मैं दीवाली में तत्काल का टिकेट ले ने स्टेशन गया| यह सोअच कर की दीवाली का समय है मैंने अपना फॉर्म पहले ही भर कर स्टेशन चला गया| वहां पैर पहले से ही काफ़ी लोग थे, मैं तीसरे स्थान था| कुछ ही देर में वहां पैर महिलाओं ने अपनी अलग पंक्ति बना ली | एक पुलिस वाले भिया भी अपने अंदाज़ में आकर बोले बाबु जी टिकेट देदो ड्यूटी पर जाना है | एक महिला के पति जी टहल रहे है पत्नी लाइन में लगी है | लड़किया भी बह्स कर रही है उन् लोगों से जो पहले आए है की किसने कहा था इतनी जल्दी आने को ... अब सबसे मज़े की बात महिलाये हो गयी, पुलिस वाला हो गया कमी किसकी थी? तोडा सोचिये ...बस एक विकलांग की... तोडी देर में मुझे पता चला की मेरे आगे एक विकलांग था , मैं तुंरत अपने स्थान से एक कदम पीछे हटा और उसे आगे कर दिया

अब सुबह के आठ बज गया था समय सुरु टिकेट बुकिंग कासबने हल्ला मचाना शुरू किया महिलाएं पहले हम लोग है| पुलिस वाला अरे मुझे दे दीजिये टिकेट ड्यूटी पे जाना हैतभी मेने विकलांग से पुछा आपको कहाँ जाना है , तो बोला मुझे नही जाना है मेरे भाई को जान है| सब लोग किद्की पे टूट पड़े|

सभी विकलांग से पूछ रहे है कहाँ जाना है लेकिन किसी को यह नही की उसका टिकेट दिलवा दे|

पहले तो मेने कुछ सब्र किया की इन् लोगों को टिकेट लेलेने दूँ , लेकिन लोगों की बातें और मानसिकता देख कर मुझे भी गुस्सा ही गया | पहले आपना टिकेट लिया फ़िर विक्लान को टिकेट दिलाया |

बाद में मैं यह सोचने लगा की...

कैसे है पति देव जो कम उमर के है लेकिन अपनी पत्नी का सहारा लेकर टिकेट लेना की इच्छा रखते है|

पुलिस वाले भिया उनकी ड्यूटी है तो बाकी भी ड्यूटी वाले हो सकते है|

और सबसे जायदा ग़लत विकलांग का भाई जो कुछ मजे करके अपने भाई को लाइन में लगा देता है| और दुष्ट भी क्योंकि बाद में पता चलता है की वोह भाई नही दोस्त है

हर एक आदमी दूसरे को पीछे करने में कितना गिर रहा है वहां दिखा|

महिलओं को यह सब छोड़ देना चहिये क्योकि इतना प्रचार किया गया इनके लिएय की लड़का लड़की एक सामान फ़िर भी इनको समझ नही आता है| ठीक है अगर टिकेट लेना ही था टू : का अनुपात रखती|

अगर यही रही तो भारत आगे नही काफ़ी आगे चला जयीगा |